Monday, June 22, 2020

राजा की बीमारी | Short moral story in Hindi

Short moral story in Hindi

बात पुराने समय की है, एक बड़े से राज्य पर एक राजा राज्य करता था | वैसे तो राजा को धन, धान्य, संपत्ति आदि की कोई कमी नहीं थी | राजा के दो पुत्र भी थे, उसका राज्य भी खुशहाल था | किन्तु फिर भी राजा किसी न किसी बात से हमेशा असंतुष्ट ही रहता था | राजा हमेशा दूसरे राजाओं के सुख आदि से अपनी तुलना करता और हमेशा कुंठा की भावना से ग्रसित रहता था | 

राजा को हमेशा ही यह चिंता सताती कि बाकी सभी राजा उससे ज्यादा सुखी हैं या वह हमेशा सोचता कि उस फलां राजा के पास यह है, मेरे पास नहीं है | कहने का मतलब यह है कि राजा को दूसरे लोगों के सुख से ईर्ष्या होती थी जिसके कारण वह परेशान रहना लगा | धीरे धीरे उसकी यह समस्या बढती गयी और वह बीमार रहने लगा | 

राजा के दरबारियों ने कई वैद्य को दिखाया किन्तु राजा की बीमारी में कोई सुधार नहीं हुआ | धीरे धीरे राजा की हालत और ज्यादा ख्रराब होने लगी और उसका चलना फिरना भी बंद हो गया | राजा की ऐसी हालत होने पर राजा के मंत्री और अधिकारी गण चिंतित हो गए , उन्होंने राजा की ओर से एक घोषणा करायी कि जो भी राजा की बीमारी ठीक करेगा उसको ढेर सारा ईनाम राजा की ओर से दिया जायेगा | 

short moral story in Hindi
Short moral story in Hindi

ईनाम की घोषणा सुनकर दूर दूर से वैद्य आदि राजा के उपचार हेतु आये, उन्होंने तरह तरह की दवाइयां राजा को दी किन्तु किसी से भी कोई फायदा नहीं हुआ | राजा की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ | राजा की ऐसी हालत देखकर सब लोगों की चिंताए बढ़ गयी, सभी ने अपनी अपनी तरफ से सभी युक्तियाँ अपनाई लेकिन सब की सब युक्तियाँ बेकार साबित हुई | 

तभी एक ऋषि राजा की ख़राब हालत का समाचार सुनकर राजा को देखने आये, ऋषि काफी ज्ञानी थे, वह देखते ही राजा की बीमारी समझ गए | उन्होंने राजा से कहा – आपकी बिमारी को ठीक करने का एक ही उपाय है, आप को किसी ऐसे व्यक्ति का अंगवस्त्र धारण करना होगा जो पूरी तरह से सुखी हो, जिसको किसी प्रकार का कोई दुःख न हो | ऋषि ने कहा मैं वचन देता हूँ कि यदि आपने ऐसा किया तो आप पूरी तरह ठीक हो जायेंगे | 

राजा ने ऋषि की बात सुनकर सैनिकों को आदेश दिया कि जाओ और ऐसे व्यक्ति का अंगवस्त्र लेकर आओ | राजा की आज्ञा पाकर सैनिक सबसे पहले पड़ोसी राजा के यहाँ गए और पूछा कि क्या आप पूरी तरह सुखी हैं ? राजा ने कहा – वैसे तो मुझे कोई दुःख नहीं किन्तु मेरे कोई पुत्र नहीं है, इस बात से बस मैं दुखी हूँ, पूरी तरह से सुखी तो मैं भी नहीं हूँ | राजा की बात सुनकर सैनिक वहां से वापस आ गए और एक दूसरे राज्य में गए | 

सैनिक दूसरे राज्य के राजा के पास जाकर बोले – राजन ! क्या आप पूरी तरह से सुखी हैं ? राजा ने उत्तर दिया – नहीं ! हमारे राज्य पर अभी अभी दूसरे राज्य ने आक्रमण कर दिया जिसमें हमें अपना काफी बड़ा भूभाग गंवाना पड़ा और हमारे अनेक वीर योद्धा मारे गए | हम बहुत दुखी हैं | राजा की बात सुनकर सैनिक वहां से भी लौट आये | 

इसी तरह सैनिक दूर दूर तक अनेक राज्यों में गए किन्तु कोई ऐसा राजा नहीं मिला जो पूरी तरह से सुखी हो | सैनिक वापस लौट आये और अपने राजा को सारा हाल बताया | ऋषि ने राजा और सैनिको से कहा कि आम लोगों से भी पूछा जाये, क्या पता कोई आम नागरिक ही ऐसा मिल जाये | राजा ने सैनिको को आदेश दिया कि हर एक नागरिक से भी पूछा जाये, दूर दूर तक जितने भी राज्य हैं, सभी में ढूँढा जाये | 

Short moral story in Hindi

राजा की आज्ञा पाकर सैनिकों ने कई दल बनाये और हर एक राज्य में पड़ताल शुरू कर दी | सैनिक जिससे भी पूँछते, वह कोई न कोई दुःख बताता | बहुत दिनों तक ढूँढने पर भी सैनिकों कोई कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो पूरी तरह से सुखी हो | सभी सैनिक थक हार कर वापस ही लौट रहे थे कि तभी रास्ते में एक साधू तपस्या करते हुए मिले | सनिकों ने सोचा क्यूँ न इन्हीं से पूछा जाये, इन्हें तो कोई दुःख नहीं होना होना चाहिए | 

सैनिकों से साधू को प्रणाम किया और पूछा – क्या आप पूरी तरह से सुखी हैं ? साधू ने कहा – हाँ ! मैं पूरी तरह से सुखी हूँ | मैं तो सिर्फ ईश्वर के ध्यान में ही रात दिन रहता हूँ, मुझे और कोई इच्छा नहीं | साधू का उत्तर सुनकर सैनिक बहुत खुश हुए और कहा – महाराज अगर ऐसा है तो आप अपना कोई अंगवस्त्र हमें दे दीजिये, हमारे राजा को आवश्यकता है | 

इस पर साधू बोले – मेरे पास तो सिर्फ यही एक लंगोट है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं, अगर ये भी मैं तुम्हे दे दूंगा तो मैं नग्न हो जाऊंगा | इसलिए मेरे पास तुम्हे देने के लिए कोई वस्त्र नहीं है | साधू की बात सुनकर सैनिक वापस लौट आये और राजा और ऋषि को सारा घटनाक्रम बताया | 

ऋषि बोले - राजन ! देखा तुमने ? इस संसार में कोई सुखी नहीं है, और यदि कोई है भी, तो उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है | अब तो तुम समझ ही गए होगे कि तुम व्यर्थ ही दूसरों के सुख से ईर्ष्या कर रहे थे, जो महज देखने में ही सुख प्रतीत होता है, वास्तव में सुखी कोई नहीं | ऋषि की बात सुनकर राजा उठता है और ऋषि के पैरों में गिरकर माफ़ी मांगता है, कहता है – ऋषिवर मुझे क्षमा करो, मुझसे भूल हो गयी | मैं आगे से ऐसी अज्ञानता नहीं करूँगा | राजा बिलकुल ठीक हो जाता है और ऋषि का शिष्य बन जाता है |

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें दूसरों के सुख को देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योकि वास्तव में दुनियां में कोई सुखी नहीं हैं | ***


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